नई दिल्ली। ई- कचरे से निपटने की अब तक कोशिशों को सफल न होते देख केंद्र सरकार ने इससे जुड़ी पूरी नीति को ही बदल दिया है। इसमें ई-कचरा पैदा करने वालों यानी ब्रांड उत्पादकों की इसके री-साइक्लिंग की अब पूरी जवाबदेही होगी। ऐसा न करने पर भारी जुर्माना, उत्पाद की बिक्री पर रोक सहित आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है, जिसमें जेल भी जाना पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने फिलहाल बदलाव से जुड़ा यह मसौदा जारी कर दिया है। साथ ही आम लोगों से सुझाव मांगे है।

अनुभवों के बाद उठाया कदम

ई-कचरे से निपटने की नीति में बदलाव से जुड़ा यह कदम सरकार ने पिछले आठ साल के अनुभवों के बाद उठाया है, जिसमें काफी कोशिशों के बाद भी ई-कचरे को कम करने में सफलता नहीं मिल पा रही है। स्थिति यह है कि मौजूदा समय में देश में जितना ई-कचरा पैदा हो रहा है, उसके सिर्फ 10 प्रतिशत हिस्से का ही संग्रह हो पा रहा है।

हर साल पैदा हो रहा 11 लाख टन ई-कचरा

एक अनुमान के मुताबिक देश में मौजूदा समय में हर साल करीब 11 लाख टन ई-कचरा पैदा हो रहा है। हालांकि देश में मौजूदा समय में ई-कचरे के अधिकृत री-साइक्लरों की संख्या करीब साढ़े चार सौ है, जिनकी री-साइक्लिंग की क्षमता सालाना 14 लाख टन है। खासबात यह है कि ई-कचरे से निपटने से जुड़े इन संभावित बदलावों के बारे में ‘दैनिक जागरण’ ने पहले ही जानकारी दी थी।

अब हर हाल में री-साइकल ही करना होगा ई-कचरा

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी किए गए इस मसौदे के मुताबिक ई-कचरा को अब हर हाल में री-साइकल ही करना होगा। हालांकि यह काम री-साइक्लर करेंगे, जो अब ई-कचरे का संग्रह भी करेंगे और उसका निस्तारण भी करेंगे। इसके बदले उन्हें ई- कचरे से निकलने वाली कीमती धातुएं मिलेगी। साथ ही वह जितना ई- कचरा री-साइकल करेंगे, उतनी मात्रा का सर्टिफिकेट ब्रांड उत्पादकों को बेच सकेंगे।

ब्रांड उत्पादक अब संग्रहण और री-साइकल के झंझट से रहेंगे मुक्त

प्रस्तावित मसौदे में ब्रांड उत्पादक को ई-कचरे के संग्रहण और री-साइकल के झंझट से मुक्त कर दिया गया है। इसके बदले अब उन्हें पैदा किए जाने वाले ई-कचरे की मात्रा के बराबर या फिर तय किए मानक के तहत किसी भी री-साइक्लर से सिर्फ उतनी मात्रा का री-साइक्लिंग का सर्टिफिकेट खरीदना होगा, जिसकी कीमत का निर्धारण ब्रांड उत्पादक व री-साइक्लर आपस में तय करेंगे।

आपराधिक कार्रवाई भी होगी

बाद में इसी सर्टिफिकेट को ब्रांड उत्पादकों को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सामने पेश करना होगा। इसके आधार पर ही उन्हें ईपीआर (उत्पादक उत्तरदायित्व प्राधिकार) प्रदान किया जाएगा। ऐसा न करने पर ब्रांड उत्पादक के खिलाफ उत्पाद को बेचने पर रोक सहित आपराधिक कार्रवाई भी होगी।