
गजा के खिलाफ दो साल से लंबे अमेरिका-समर्थित इजराइली नरसंहार का दो-टूक विरोध करने की जगह, कभी हां और कभी ना से दोनों पक्षों को खुश रखने की कोशिश करने और वास्तव में, नरसंहार के शिकार और नरसंहार करने वाले, दोनों को एक ही पलड़े पर तोलने की कोशिश करने के जरिए, इजराइली-अमेरिकी नरसंहार की पीठ ही थपथपाने से भी प्रधानमंत्री मोदी को संतोष नहीं हुआ। ध्वस्त कराने के बाद गज़ा के पुनर्निर्माण के नाम पर पेश किए जा रहे, खुल्लमखुल्ला साम्राज्यवादी अचल संपत्ति प्रोजैक्ट को अंजाम देने के लिए, खुद ट्रम्प के नेतृत्व में गठित कथित पीस बोर्ड में बाकायदा शामिल होने-न होने से लेकर, फिलिस्तीनी इलाकों में जबरन यहूदी बस्तियां बसाए जाने की निंदा के संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव पर एक बार फिर, मोदी का भारत कभी हां कभी ना के झूले पर झूलता रहा। और जब एपस्टीन फाइलों के बढ़ते खुलासों की बढ़ती गर्मी से बचने के लिए, ट्रंप-नेतन्याहू जोड़ी ने हैडलाइन बदलने के लिए ईरान के खिलाफ हमले की साफ तौर पर तैयारियां शुरू कर दीं, ऐन मौके पर प्रधानमंत्री मोदी को भारत के इजरायल के साथ खड़े होने का प्रदर्शन करने के लिए, इजरायल का दौरा करना जरूरी लगा।
और 28 फरवरी की दोपहर में, एक स्वतंत्र, संप्रभु तथा परंपरागत रूप भारत के मित्र देश, ईरान पर इजरायल-अमेरिका के संयुक्त हमले के बाद? एक स्वतंत्र देश पर और वहां 'शासन बदलवाने' या रिजीम चेंज के घोषित इरादे से, तमाम अंतर्राष्ट्रीय नियम-कायदों का उल्लंघन करते हुए, बिना किसी उकसावे के किए गए हमले के खिलाफ मोदी के भारत के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला — हमला करने वालों की निंदा को तो छोड़ ही दो, हमले की निंदा का भी एक भी शब्द। हां! विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी से, आम तौर पर शांति की अपील और प्रभावित देशों में भारतीय नागरिकों से सावधानी तथा आवश्यकता पड़ने पर दूतावास से संपर्क करने का परामर्श जारी कराने की खाना-पूरी पर ही संतोष कर लिया गया।
लेकिन, मोदी के भारत को हमलावर और हमले के शिकार के बीच, इस कथित 'तटस्थता' की मुद्रा से भी संतोष नहीं हुआ। अमेरिका-इजरायल ने हमले के पहले ही दिन, जब टार्गेटेड हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता तथा राष्ट्राध्यक्ष, अयातुल्ला खामनेई तथा कई सैन्य नेताओं की हत्या कर दी गयी और राष्ट्रपति ट्रंप ने इस 'बड़ी कामयाबी' के लिए बाकायदा गाल बजाना जरूरी समझा, मोदी के नये भारत ने इस पर पूरी तरह से चुप्पी ही साध ली।
यह इसके बावजूद था कि अयातुल्ला खामनेई सिर्फ पड़ोसी मित्र देश के राष्ट्राध्यक्ष ही नहीं थे, वह एशिया में शिया मुसलमानों के सबसे बड़े धर्मगुुरु भी थे, जिसके चलते खुद भारत में भी शिया आबादी वाले उत्तर प्रदेश में ही नहीं, ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले कश्मीर तथा देश के दूसरे अनेक हिस्सों में भी, बड़ी संख्या में लोग शोक जताने के लिए उमड़ पड़े थे। ये भावनाएं इसलिए और भी प्रबल थीं कि खामनेई की इजराइली-अमेरिकी हमले में लक्षित हत्या को जुल्म की ताकत के हाथों 'शहादत' के रूप में देखा जा रहा था और आम तौर पर इस्लामी परंपरा में और खासतौर पर शिया परंपरा में, 'शहादत' का मुकाम बहुत ऊंचा माना जाता है।
हैरानी की बात नहीं है कि खामनेई की 'शहादत' ने ईरानी जनता को जिस तरह अमेरिकी-इजराइली हमले के खिलाफ एकजुट किया है, उस तरह शायद खामनेई की मौजूदगी नहीं कर सकती थी। बहरहाल, प्राय: हर चर्चित व्यक्ति की मृत्यु या जन्म दिन पर संदेश देने के लिए विख्यात, प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार ने, इस पूरे घटनाक्रम पर एक शब्द तक कहना जरूरी नहीं समझा।
दूसरी ओर, इस युद्घ से जुड़े घटनाक्रम पर मोदी का भारत चुप ही बना रहा। बेशक, उन्होंने अपना मुंह खोला, लेकिन एक प्रकार से यह स्पष्ट करने के लिए कि वह इस टकराव में किस की तरफ है। अमेरिकी-इजराइली हमले के जवाब में, जब ईरान ने इजरायल के अलावा अमेरिकी सैन्य ताकत के केंद्रों के तौर पर पश्चिम एशिया में कतर, कुवैत, जोर्डन, बहरीन, ओमान आदि में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों व अन्य ठिकानों को अपनी मिसाइलों तथा ड्रोनों से निशाना बनाया, इस क्रम में यूएई भी हमले की जद में आया था।
नरेंद्र मोदी ने इस तीखे टकराव के बीच, यूएई पर हमले (जाहिर है कि ईरानी) को ही 'कड़ी निंदा' के लायक समझा ; उसके नुकसान को ही शोक जताने लायक समझा ; उसके साथ एकजुटता जताने की जरूरत समझी! इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ने यूएई के राष्ट्रपति, जायेद अल नहयान को विशेष रूप से टेलीफोन किया था और बाद में उनसे हुई बातचीत की जानकारी बाकायदा सार्वजनिक भी की गयी।
इस सारे घटनाक्रम का किंचित विस्तार से जिक्र हमने यह ध्यान दिलाने के लिए किया है कि अमेरिका-इजरायल जोड़ी की सामराजी युद्घोन्मादी मुहिम का पिछलग्गू बनाकर भारत को नरेंद्र मोदी ने उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां वह परोक्ष रूप से एक स्वतंत्र देश की (ईरान) की इस जोड़ी के अकारण हमले के खिलाफ बचाव की कार्रवाइयों की निंदा के जरिए, इस सामराजी मुहिम का ही समर्थन कर रहा है। याद रहे कि यह आक्रांता और हमले के शिकार, दोनों के बीच 'बराबरी' के पाखंड से नीचे गिरने का मामला है। यहां से आक्रांता का प्रत्यक्ष रूप से साथ देना, एक कदम ही दूर रह जाता है। इसमें से भी आधा कदम तो मोदी राज ने, सिर्फ और सिर्फ यूएई पर हमले को निंदनीय बताने के जरिए उठा भी लिया है।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह साम्रज्यवादविरोधी स्वतंत्रता संघर्ष से निकली, भारत की साम्राज्यवाद के सामने स्वतंत्र नीति और साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही दुनिया के साथ एकजुटता की समूची नीति के ही त्यागे जाने का मामला नहीं है, जिसे मोदी राज के बारह वर्षों में गुटनिरपेक्ष आंदोलन से पूरी तरह से मुंह मोड़े जाने ने पहले ही निर्णायक बिंदु पर पहुंचा दिया था। लेकिन, साम्राज्यवादविरोधी स्वतंत्रता संघर्ष से न सिर्फ दूर रहे, बल्कि उसकी जड़ें काटने में ही जुटे रहे, आरएसएसस के राजनीतिक मोर्चे के रूप में, भाजपा और उसकी सरकार से और उम्मीद भी क्या की जा सकती थी। लेकिन, यह तो और आगे बढ़कर, स्वतंत्र विदेश नीति के ही पलटे जाने और विकासशील दुनिया के खिलाफ साम्राज्यवादी हुकुमशाही के खेमेे के साथ जा मिलने का मामला है।
जाहिर है कि यह सब करते-कराते हुए, जब-तब विकासशील दुनिया या ग्लोबल साउथ का मुखिया होने के अपने मुंह से खुद ही दावे करने से, मोदी के भारत को प्रतिष्ठा नहीं मिलती है। उलटे सच्चाई यह है कि न सिर्फ विकासशील दुनिया ने मोदी के भारत को अपना मानना बंद कर दिया, जिसका पता पर्यावरण से लेकर विश्व व्यापार तक, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वार्ताओं में लगातार मिलता रहा है, बल्कि एक दुरंगे चरित्र के रूप में मोदी का भारत बदनाम हो रहा है। पहले गज़ा और अब ईरान पर अमेरिकी-इजराइली हमला, भारत की बदनामी के बड़े मौके बन गए हैं। विश्व एआई समिट के दौरान दो-दर्जन युवाओं के बनियान/ टीशर्ट में प्रदर्शन पर तो दुनिया की शायद ही कोई नजर पड़ी हो, पर स्वतंत्र भारत की सम्मानित विदेश नीति और उसके बुनियादी मूल्यों से मोदी राज की यह पल्टी जरूर, आम तौर पर दुनिया भर में और खासतौर पर विकासशील दुनिया में भारत का नाम बदनाम करा रही है।
और मोदी राज के दुर्भाग्य से यह भी गुनाह बेलज्जत का मामला है। कम से कम ट्रंप के राज के एक साल से ज्यादा में यह सब करने का भी भारत को जो नतीजा मिला है, इसी को दिखाता है। यह कोई संयोग ही नहीं है कि ट्रंप निजाम ने, भारत पर सबसे ज्यादा टैरिफ थोपा था और बाद में उसी टैरिफ को हथियार बनाकर, उसने भारत पर एक ऐसा असमानतापूर्ण व्यापार समझौता थोप दिया है, जो न सिर्फ भारत के अपने आर्थिक हितों को चोट पहुंचाने वाला समझौता है, बल्कि एक ऐसा समझौता भी है, जो इस असमानता के साथ, अमेरिका की मर्जी की नीतियों पर चलने की शर्तों का योग करता है। यह भारत की संप्रभुता के गिरवी रखे जाने को संस्थागत रूप देने वाले समझौतों का रास्ता है। इस तरह, तथाकथित व्यावहारिकता के तर्क से वास्तव में भारत को अपनी स्वतंत्रता तथा संप्रभुता में कतरब्यौंत को स्वीकार करने के ही रास्ते पर धकेला जा रहा है। क्या यह एक स्वतंत्र देश के लिए बदनामी का ही रास्ता नहीं है?
आखिर में एक बात और। अब जब सारी दुनिया में, बाल यौन उत्पीड़क दरिंदे एपस्टीन की फाइलों के खुलासों के असर से इस्तीफों से लेकर गिरफ्तारियां तक हो रही हैं और तरह-तरह के कदम उठाए जा रहे हैं, भारत में मोदी सरकार का रुख हरदीप पुरी से लेकर, अनिल अंबानी तक के नाम आने के बावजूद, एक प्रकार से क्लीन चिट देने का ही नजर आता है। क्या एक दरिंदे के साथ संपर्कों का इस तरह सामान्य बनाया जाना, दुनिया भर में भारत की बदनामी नहीं करा रहा है?
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
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