मुंबई। टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर बहस तेज हो गई है। टाटा ट्रस्ट्स के उपाध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इस विचार का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है यदि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत करता है, तो लिस्टिंग लगभग अनिवार्य हो जाएगी। यह बयान समूह में शीर्ष स्तर पर मतभेद बढ़ने का संकेत है, क्योंकि श्रीनिवासन का यह रुख टाटा ट्रस्ट्स के पिछले फैसलों से अलग है।
अल्पसंख्यक शेयरधारकों को फायदा
श्रीनिवासन के अनुसार, टाटा संस की लिस्टिंग से अल्पसंख्यक शेयरधारकों को बड़ा लाभ मिल सकता है। खासतौर पर शापूरजी पल्लोनजी (एसपी) समूह, जिसकी कंपनी में 18.37% हिस्सेदारी है, अपनी हिस्सेदारी को भुना सकेगा। यह समूह लंबे समय से अपनी हिस्सेदारी से निकलने के लिए रास्ता मांग रहा है, ताकि वह अपने कर्ज को कम कर सके।
SBR फ्रेमवर्क में बदलाव की तैयारी
हालांकि, यह रुख टाटा ट्रस्ट्स के पिछले फैसलों से अलग है। जुलाई 2025 में ट्रस्ट्स ने एक प्रस्ताव पारित कर टाटा संस को गैर-सूचीबद्ध (अनलिस्टेड) रखने का निर्णय लिया था। ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने हाल ही में कंपनी को लिस्टिंग से बचाने के विकल्प तलाशने को कहा था। आरबीआई जल्द ही एनबीएफसी के लिए अपने स्केल-बेस्ड रेगुलेशन (SBR) फ्रेमवर्क में बदलाव कर सकता है।
गवर्नेंस और नेतृत्व पर उठे सवाल
संकेत हैं कि टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी से छूट नहीं मिल सकती। ऐसी स्थिति में नियामकीय नियमों के चलते कंपनी को लिस्टिंग की दिशा में कदम बढ़ाना पड़ सकता है। समूह में मतभेद सिर्फ लिस्टिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रबंधन और प्रदर्शन पर भी सवाल उठ रहे हैं। टाटा संस चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल पर भी चर्चा टाल दी गई है। एयर इंडिया और टाटा डिजिटल के प्रदर्शन पर भी बोर्ड में चिंता जताई गई है।
ट्रस्ट्स में विवाद और इस्तीफे
हाल ही में ट्रस्ट्स के भीतर विवाद तब बढ़ गया, जब एक याचिका में कुछ ट्रस्टियों की पात्रता पर सवाल उठाए गए। इसके बाद वेणु श्रीनिवासन ने इस्तीफा दे दिया, जबकि विजय सिंह ने इस्तीफा नहीं दिया। श्रीनिवासन ने आरोप लगाया कि उनसे तथ्य छुपाकर इस्तीफा लिया गया, जिससे विवाद और गहरा गया। कुल मिलाकर, टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर स्थिति जटिल बनी हुई है। एक तरफ नियामकीय दबाव और निवेशकों की मांग है, तो दूसरी ओर परंपरा और नियंत्रण बनाए रखने की चिंता है। आने वाले समय में आरबीआई के फैसले और ट्रस्ट्स के रुख से इस मुद्दे की दिशा तय होगी।
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