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दुर्ग - भिलाई और भी
गली-कूचों में मौत का सौदा: सड़कों पर नशे के ज़हर का खुला कारोबार जारी
  • Written by - amulybharat.in
  • Last Updated: 8 नवम्बर 2025,  02:21 PM IST
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पुलिस की नाकामी: दुर्ग जिले में अब भी खुलेआम बिक रहा नशा 71 केस, 155 गिरफ्तारी, फिर भी सड़कों और मोहल्लों में जहर का कारोबार जारी

 भिलाई, दुर्ग, पाटन/ज्वाला एक्सप्रेस न्यूज 

दुर्ग पुलिस ने पिछले सात महीनों में नशा तस्करों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई का दावा किया है। आंकड़े भी दमदार हैं — 71 मामले दर्ज, 155 आरोपी गिरफ्तार, 21 महिलाएं भी पकड़ी गईं, और सैकड़ों किलो गांजा, हेरोइन व ब्राउन शुगर जब्त।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे नशे का कारोबार रुका......
जवाब है — नहीं।
आज भी दुर्ग, भिलाई और आसपास के इलाकों में खुलेआम नशे का व्यापार जारी है। शहर के कई मोहल्लों में शाम ढलते ही “मौत के सौदागर” सक्रिय हो जाते हैं और पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियाँ सिर्फ मुख्य सड़कों तक ही सीमित रहती हैं।

कागज़ पर कार्रवाई, ज़मीनी हकीकत अलग
दुर्ग पुलिस के रिकॉर्ड बताते हैं कि जनवरी से जुलाई के बीच एनडीपीएस एक्ट के तहत 71 केस दर्ज किए गए। इसके बावजूद तीन महीनों  में नशे के कारोबार पर लगाम लगने की बजाए इजाफा होता नजर आ रहा है, शहर की गलियों और बस्तियों में नशे का कारोबार जारी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई जगहों पर “चिट्ठा”, “गांजा” और “सिरप” की बिक्री खुलेआम हो रही है, और पुलिस को इसकी खबर होते हुए भी “कार्रवाई का टाइमटेबल” तय रहता है।

6 थाने पूरी तरह निष्क्रिय
दुर्ग जिले के 23 थानों में से 6 थाने ऐसे हैं जहां कार्रवाई शून्य रही —
भिलाई भट्ठी, अमलेश्वर, रानीतराई, धमधा, बोरी और अंडा।
इन क्षेत्रों में नशा वितरण की शिकायतें लगातार मिल रही हैं, पर पुलिस की फाइलों में सब कुछ “शांत” दर्ज है।

स्थानीय निवासियों का सवाल है .....

“अगर जिले में 155 तस्कर पकड़े गए, तो हमारे इलाके में रोज शाम को दिखने वाले ये सप्लायर कौन हैं....

सबसे ज्यादा कार्रवाई मोहननगर थाना ने की, लेकिन बाकी जगह स्थिति निराशाजनक है। कई थाने साल के आधे समय तक एक भी गिरफ्तारी नहीं कर पाए।
पुलिस की सक्रियता “कुछ इलाकों” तक सीमित दिखती है, जिससे तस्कर अब अपना ठिकाना बदलकर गांवों और औद्योगिक क्षेत्रों में कारोबार चला रहे हैं।

नशा के खिलाफ जंग या औपचारिकता.....
पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि अब तक –ज्वाला एक्सप्रेस न्यूज इसकी पुष्टि नहीं करता आंकड़े और अधिक है...... अगले अंक में 

297 किलो गांजा,

30,518 टेबलेट,

26,358 कैप्सूल,

56 बोतल सिरप,

25.48 ग्राम ब्राउन शुगर और

306.2 ग्राम हेरोइन जब्त की गई।

इन जब्तियों से यह तो साबित होता है कि नशे की जड़ें गहरी हैं, पर सवाल उठता है कि इतना माल कहां से आ रहा है और कैसे पहुंच रहा है....
सीमा चौकियों पर निगरानी कमजोर है या स्थानीय स्तर पर मिलीभगत ....

बाहरी राज्यों का नेटवर्क, पर निगरानी ढीली
दुर्ग पुलिस का दावा है कि वह बाहरी राज्यों के तस्करों पर भी नजर रखे हुए है, मगर हर गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों में नई सप्लाई चेन बन जाती है।
ऐसा लगता है जैसे पुलिस पकड़ने में तेज है, पर रोकने में नाकाम।

एसएसपी का बयान और हकीकत का अंतर

“मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ लगातार अभियान जारी है। दुर्ग को नशा मुक्त जिला बनाने के लिए सभी टीमें सक्रिय हैं।”

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फ़ाइल फोटो 

पर ज़मीनी रिपोर्ट बताती है कि मोहल्लों में नशे की बिक्री ‘ऑर्डर ऑन कॉल’ तक पहुंच चुकी है। स्कूल-कॉलेजों के बाहर भी गुटखे और नशीली टैबलेट्स खुलेआम बेचे जा रहे हैं।

युवाओं की बर्बादी पर खामोश सिस्टम
हर महीने नशे के शिकार युवाओं की गिरफ्तारी और अस्पतालों में भर्ती के मामले बढ़ रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं, जिंदगी बर्बाद हो रही है।
फिर भी पुलिस, समाज और प्रशासन “सफलता के आंकड़े” गिनाने में व्यस्त हैं।

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फ़ाइल फोटो 

ज्वाला एक्सप्रेस न्यूज की पड़ताल
ज्वाला एक्सप्रेस की टीम ने शहर के कुछ संवेदनशील इलाकों – मोहननगर, वैशालीनगर, नेवई, सुपेला और पाटन – में पड़ताल की।
कई युवाओं ने बताया कि “नशा आसानी से मिल जाता है, बस भरोसे का आदमी चाहिए।”
इससे साफ है कि नशा तस्करी की जड़ें पुलिस की पकड़ से कहीं गहरी हैं।

समाप्ति नहीं, यह शुरुआत है
दुर्ग में नशा कारोबार पर अंकुश लगाने की बात हर वर्ष होती है, लेकिन नतीजे “वक्त के साथ फीके” पड़ जाते हैं।
पुलिस की कार्रवाई ताबड़तोड़ है, मगर रणनीति अधूरी।
जब तक गिरफ्तारी के साथ सप्लाई चैन, राजनीतिक संरक्षण और पुलिस के भीतर की मिलीभगत पर चोट नहीं होगी — नशे का धंधा चलता रहेगा।

  ज्वाला एक्सप्रेस न्यूज़ ने 
दुर्ग के अनेकों लोगों से बात की उनका मत है कि पुलिस अगर वाकई नशे को खत्म करना चाहती है, तो उसे “दिखाने वाली कार्रवाई” नहीं, बल्कि गहराई में उतरकर सफाई अभियान चलाना होगा।
हर गिरफ्तारी के बाद नया सप्लायर तैयार हो रहा है — यह प्रशासनिक नाकामी नहीं तो और क्या है?
अब वक्त है “पकड़ो नहीं, खत्म करो” नीति अपनाने का।

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