अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जो लगभग 2.5 अरब वर्ष पुरानी मानी जाती है। वहीं ऐसा माना जाता है कि यह डायनासोर के युग से भी बहुत पहले की है। क्योंकि डायनासोर करीब 23 करोड़ वर्ष पहले अस्तित्व में आए थे। वहीं इस रेंज की चट्टानें पृथ्वी के शुरुआती इतिहास की गवाह हैं और यह फोल्ड माउंटेन सिस्टम का हिस्सा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह रेंज समय के साथ घिसती गई है, लेकिन आज भी अपनी मजबूती से खड़ी है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उठा विवाद
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है, जिसके बाद देशभर में बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार ने अरावली की संशोधित परिभाषा दी है, लेकिन कई लोगो चिंता जता रहे हैं कि इससे बड़े पैमाने पर खनन शुरू हो सकता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन वहीं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इन आशंकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है
क्या बोले पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ?
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंजूर की गई इस नई परिभाषा से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र संरक्षित रहेगा। सरकार का तर्क है कि यह फैसला अरावली की रक्षा को मजबूत करेगा, न कि कमजोर। लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अगर परिभाषा में बदलाव से कुछ हिस्से खनन के लिए खुल गए, तो पूरी श्रृंखला पर असर पड़ेगा। वे कहते हैं कि अरावली पहले से ही अवैध खनन और शहरीकरण की वजह से कमजोर हो रही है।
दिल्ली, हरियाणा, और राजस्थान के जरूरी, अरावली!
दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों के लिए अरावली जीवन का आधार है क्योंकि यह जल संरक्षण में मुख्य भूमिका निभाती है। दिल्ली-एनसीआर में यह हरित पट्टी के रूप में काम करती है, जो धूल और प्रदूषण को रोकती है और स्वच्छ हवा प्रदान करती है। हरियाणा और राजस्थान में यह सूखे इलाकों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करती है, जिससे कृषि और पशुपालन संभव होता है। बिना अरावली के ये राज्य रेगिस्तानी हो सकते हैं, क्योंकि यह थार के रेत को आगे बढ़ने से रोकने का भी काम करती है। अरावली थार के मरुस्थल के सामने एक दीवार की भांति खड़ी है। इसके न होने पर पूरे उत्तर भारत में थार के रेगिस्तान का रेत फैल जाएगा।
अरावली की भौगोलिक विशेषताएं
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में एक है। यह दिल्ली से शुरू होकर दक्षिण-पश्चिम दिशा में यह करीब 670 से 700 किलोमीटर तक फैली हुई है। यह हरियाणा, राजस्थान और गुजरात राज्यों से गुजरती है और अहमदाबाद के पास जाकर खत्म होती है। इसकी चौड़ाई 10 से 100 किलोमीटर तक है, जो जगह-जगह पर अलग-अलग है। अरावली की औसत ऊंचाई 600 से 900 मीटर है, लेकिन राजस्थान के माउंट आबू में स्थित गुरु शिखर इसकी सबसे ऊंची चोटी है, जो 1722 मीटर ऊंची है।
गंगा के मैदान की रक्षक
भौगोलिक रूप से यह उत्तर-पश्चिमी भारत की रीढ़ की हड्डी की तरह है, जो पूरे क्षेत्र को मजबूती देती है। अगर आप नक्शे पर देखें, तो यह श्रृंखला थार रेगिस्तान को गंगा के मैदानों से अलग रखती है। इससे रेगिस्तान की रेत आगे नहीं फैल पाती। इसके अलावा दिल्ली जैसे बड़े शहरों के लिए यह प्राकृतिक दीवार की तरह काम करती है।
पर्यावरणीय महत्व
अरावली एक बड़ा पर्यावरणीय हॉटस्पॉट है, जहां विविध प्रकार के पेड़-पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं। यह वर्षा के पानी को सोखकर भूजल स्तर को बनाए रखती है। इसके अलावा यह कई नदियों के स्रोत का आधार है। यहां के जंगल प्रदूषण को कम करने में मदद करते हैं। यह जंगल कार्बन को अवशोषित करने का काम करते हैं, जिससे जलवायु संतुलन बना रहता है। इसके अलावा, अरावली पर्वतमाला खनिजों से भरपूर है, जैसे लोहा और तांबा, जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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