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“जिन्हें खुजली हो, वही सवाल पूछें” — बाघेश्वर धाम सरकार की टिप्पणी से पत्रकारों में आक्रोश, लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस तेज
  • Written by - amulybharat.in
  • Last Updated: 28 दिसम्बर 2025,  07:26 PM IST
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“जिन्हें खुजली हो, वही सवाल पूछें” — बाघेश्वर धाम सरकार की टिप्पणी से पत्रकारों में आक्रोश, लोकतांत्रिक मूल्यों पर बहस तेज

दुर्ग। बाघेश्वर धाम सरकार के नाम से चर्चित कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा पत्रकारों को लेकर की गई अशोभनीय टिप्पणी ने प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में नई बहस को जन्म दे दिया है। इन दिनों भिलाई के जयंती स्टेडियम में चल रही उनकी कथा के दौरान, प्रेस से बातचीत में पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने खीज व्यक्त करते हुए कहा— “जिन पत्रकारों को खुजली हो, वही सवाल पूछें।”

इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बीच पहले से ही बयानबाजी का दौर जारी है। इसी कड़ी में आज भूपेश बघेल ने शास्त्री को “ढोंगी” बताते हुए विवादित टिप्पणी की थी, जिसके बाद यह मामला और गरमा गया।

पत्रकार संगठनों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में प्रभाव रखने वाले किसी भी व्यक्ति से संयम और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। प्रेस वार्ता का अर्थ ही प्रश्न–उत्तर का संवाद होता है, ऐसे में सवाल पूछने को “खुजली” से जोड़ना न केवल पत्रकारिता पेशे का अपमान है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी प्रहार है।

आलोचकों का तर्क है कि जब सार्वजनिक व्यक्ति अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया का सहारा लेते हैं, तब पत्रकार स्वीकार्य होते हैं, लेकिन जैसे ही सवाल असहज हो जाते हैं, अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाने लगता है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है। लोकतंत्र में सवाल पूछना जवाबदेही तय करने का सबसे सशक्त माध्यम है—चाहे वह सत्ता हो, व्यवस्था हो या धार्मिक–सामाजिक प्रभाव रखने वाला कोई व्यक्ति।

विशेषज्ञों का कहना है कि आस्था के नाम पर आलोचना से बचने की मानसिकता लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है। सम्मान और श्रद्धा का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं हो सकता। सार्वजनिक मंच पर बोले गए शब्दों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है, खासकर तब जब वक्ता पर लाखों लोगों की आस्था हो।

यह मामला अब केवल एक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद से जुड़ा सवाल बन गया है। सवाल पूछना “खुजली” नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सेहत का संकेत है—और इसे स्वीकार करना ही एक परिपक्व समाज की पहचान।

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