नई दिल्ली। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कारपोरेट कंपनियों को सलाह दी है कि सामाजिक जिम्मेवारी यानी सीएसआर को केवल कानून की बाध्यता न मानें और इसे दो प्रतिशत की सीमा में न बांधें। उन्होंने कहा कि कानून में तय दो प्रतिशत को न्यूनतम स्तर समझना चाहिए, न कि अधिकतम।
कुपोषण की समस्या को खत्म करने के लिए उन्होंने सरकार के साथ ही कारपोरेट जगत, समाज और आम लोगों से भी आगे आने की अपील की। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) द्वारा मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित पोषण पर राष्ट्रीय सीएसआर कान्क्लेव को संबोधित करते हुए गोयल ने कहा कि कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई को आंदोलन बनाना होगा। जब तक हर स्तर पर सामूहिक प्रयास नहीं होंगे, तब तक देश को कुपोषण-मुक्त बनाना मुश्किल है।
उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना तभी पूरा हो सकता है, जब देश का हर बच्चा स्वस्थ होगा। गोयल ने कहा कि सीएसआर कोई बोझ नहीं है, बल्कि समाज के लिए कुछ करने का अवसर है। खासकर कुपोषण जैसी समस्या में सीएसआर की भूमिका बेहद अहम है। उन्होंने समझाया कि पोषण पर खर्च करना दरअसल देश के भविष्य में निवेश करना है। स्वस्थ बच्चे ही भविष्य में अच्छे कर्मचारी, अच्छे नागरिक और जिम्मेदार उपभोक्ता बनेंगे। इससे कंपनियों और देश, दोनों को लाभ होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत जिस तेजी से करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने का प्रयास कर रहा है, उसी संकल्प के साथ कुपोषण को खत्म करने की जरूरत है। लक्ष्य होना चाहिए कि देश में कोई भी बच्चा कुपोषित न रहे और रोकी जा सकने वाली बीमारियों के साथ जन्म न ले। मंत्री ने कंपनियों से आग्रह किया कि उनकी सामाजिक गतिविधियां केवल शहरों तक सीमित न रहें, बल्कि गांवों और दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचें।
गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के पोषण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि कुपोषण की शुरुआत अक्सर जन्म से पहले ही हो जाती है। कार्यक्रम में दो नई सीएसआर पहल भी शुरू की गईं। भिलाई स्टील प्लांट का 'गिफ्टमिल्क कार्यक्रम' छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब चार हजार बच्चों को विटामिन ए और डी से युक्त दूध उपलब्ध कराएगा।
वहीं, आईडीबीआई बैंक का 'शिशु संजीवनी कार्यक्रम' महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में आंगनवाड़ी केंद्रों के लगभग तीन हजार बच्चों को पौष्टिक आहार देगा। मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने कहा कि बचपन और गर्भावस्था के दौरान सही पोषण ही कुपोषण से निपटने का सबसे असरदार तरीका है। उन्होंने बताया कि दूध और दुग्ध उत्पाद बच्चों की प्रोटीन की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा कर सकते हैं।
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