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लोक साहित्य जन–जीवन की गहरी अनुभूतियों से उपजा समृद्ध साहित्य
  • Written by - amulybharat.in
  • Last Updated: 24 जनवरी 2026,  08:42 PM IST
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लोक साहित्य जन–जीवन की गहरी अनुभूतियों से उपजा समृद्ध साहित्य

*रायपुर साहित्य उत्सव: दूसरे दिन लोकगीतों पर हुई जीवंत परिचर्चा*

रायपुर / रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन प्रथम सत्र में लाला जगदलपुरी मंडप में छत्तीसगढ़ के लोकगीतों पर परिचर्चा आयोजित हुई। इसमें डॉ. पीसी लाल यादव, श्रीमती शकुंतला तरार, श्री बिहारीलाल साहू और डॉ. विनय कुमार पाठक विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए तथा अपने विचार रखें।

डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ के लोकगीत मानवता के पक्षधर हैं, जो हमें रास्ता दिखाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकगीतों को गर्व से संजोकर रखने का दायित्व अब युवा पीढ़ी का है।

परिचर्चा में दूसरी वक्ता श्रीमती शकुंतला तरार ने बस्तर के लोकगीतों और उनके महत्व को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया। बस्तर के लोकगीत सुनाकर उन्होंने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने घोटुल के इतिहास, लिंगोपेन देवता की पूजा पद्धति में गाए जाने वाले ककसार गीत (जो महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं) आखेट पर जाते पुरुषों के लिए महिलाओं द्वारा गाए मंगल गीत, छेरछेरा परंपरा, जगार धार्मिक पर्व में धनकुल गीत तथा 650 वर्षों से चली आ रही बस्तर दशहरा पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बस्तर पंडुम द्वारा सरकार के कार्यों की भी सराहना की।

श्री बिहारी लाल साहू ने युवाओं को मार्गदर्शन देते हुए वर्तमान लोकगीतों, कहानियों एवं पहेलियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने पुराने समय में छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकगीतों के महत्व को उदाहरणों सहित समझाया तथा बताया कि छत्तीसगढ़ी एक समृद्ध और पूर्ण भाषा है।

अंत में डॉ. विनय कुमार पाठक ने कहा कि लोक साहित्य जन–जीवन की गहरी अनुभूतियों से उपजा समृद्ध साहित्य है। उन्होंने लोकगीतों को लेकर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करते हुए इसकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और रचनात्मक महत्ता को रेखांकित किया।

सत्र के अंत में डॉ. पीसी लाल यादव का छत्तीसगढ़ी गजल संग्रह ‘हमर का बने का गिनहा‘ तथा कविता संग्रह ‘दिन म घलो अंधियार हावय‘ का विमोचन किया। साथ ही श्रीमती वर्णिका शर्मा द्वारा निर्मित वीडियो ‘महतारी की आरती‘ का विमोचन किया गया।


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