दुर्ग। प्रसिद्ध कथावाचक एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रवक्ता गौवत्स धर्मेश महाराज ने कहा है कि शंकराचार्य कौन है या कौन नहीं, यह तय करना सरकार का कार्य नहीं है। हाल ही में मौनी अमावस्या पर प्रयागराज में शाही स्नान के दौरान ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज के साथ हुए दुर्व्यवहार पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि इस घटना से पूरा हिन्दू समाज आहत हुआ है। किसी भी शंकराचार्य या साधु-संत के साथ ऐसा व्यवहार कतई स्वीकार्य नहीं है।
सोमवार को अग्रसेन भवन, स्टेशन रोड दुर्ग में मीडिया से चर्चा करते हुए धर्मेश महाराज ने कहा कि शंकराचार्य हों या साधु-संत, वे सर्वकल्याण की भावना से कार्य करते हैं और उनके सम्मान की रक्षा होनी चाहिए।
धर्मेश महाराज राजस्थान के बीकानेर से दुर्ग पधारे हैं, जहां अधिवक्ता विजय सोनी एवं आसट परिवार दुर्ग द्वारा 9 फरवरी से 16 फरवरी तक आयोजित शिव महापुराण कथा का वे श्रद्धालुओं को रसपान कराएंगे। कथा प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से शाम 7 बजे तक होगी। कथा के दौरान महाशिवरात्रि पर्व का भी विशेष योग बन रहा है। 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के अवसर पर अधिवक्ता विजय सोनी के आदित्य नगर स्थित निवास में रात्रि चतुर्थ प्रहर की विशेष पूजा संपन्न कराई जाएगी। कथा के समापन पर 16 फरवरी को हवन-पूजन एवं महाप्रसादी का वितरण होगा।
एक प्रश्न के उत्तर में धर्मेश महाराज ने कहा कि “श्री शिवाय नमस्तुभ्यं” कोई मंत्र नहीं है, जबकि शिव महापुराण में “ॐ नमः शिवाय” ही मूल मंत्र बताया गया है। उन्होंने कथावाचकों को चेताया कि वे टोटकों या भ्रमित करने वाली बातों से दूर रहें और शास्त्रसम्मत वाचन करें, क्योंकि मूल से भटकने पर भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
धर्म और राजनीति के संबंध पर उन्होंने कहा कि राजनीति में धर्म होना चाहिए, न कि धर्म पर राजनीति। नीति से हटकर शासन करने पर विवाद उत्पन्न होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में पाश्चात्य संस्कृति और विसंगतियों के कारण नैतिकता व धार्मिकता का पतन हो रहा है, जिसे रोकने के लिए युवाओं को धर्म और संस्कृति से जोड़ना आवश्यक है।
कथा को व्यवसाय बनाने के सवाल पर धर्मेश महाराज ने स्पष्ट कहा कि कथा धर्म है, अर्थ के लिए की गई कथा वास्तविक कथा नहीं हो सकती। ऐसे आचरण से कथाकारों को दूर रहना चाहिए।
गौवत्स की उपाधि से विभूषित धर्मेश महाराज गौवंश संरक्षण के लिए भी सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि गौ सुरक्षा कानून बने या न बने, लेकिन गौ माता की रक्षा और गौ हत्या रोकने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को सख्त कदम उठाने चाहिए।
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