प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा एआई सम्मेलन के दौरान Indian National Congress पर किया गया तीखा टिप्पणी—“कांग्रेस पहले से नंगी है, कपड़े उतारने की क्या जरूरत”—सिर्फ एक राजनीतिक कटाक्ष नहीं, बल्कि देश की बदलती राजनीतिक भाषा का संकेत भी है। सवाल यह है कि तकनीक और नवाचार के मंच पर इस तरह की बयानबाजी का क्या संदेश जाता है..?
एआई जैसे उभरते क्षेत्र पर आयोजित सम्मेलन का उद्देश्य भारत की डिजिटल क्षमता, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भागीदारी को रेखांकित करना था। ऐसे मंच पर राजनीतिक तकरार का प्रवेश यह दिखाता है कि आज विकास और राजनीति के बीच की रेखाएँ धुंधली हो चुकी हैं। सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की “नकारात्मक राजनीति” के जवाब के रूप में देखता है, जबकि विपक्ष इसे सार्वजनिक संवाद की गरिमा के विरुद्ध बताता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आलोचना और विरोध राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा हैं। Bharatiya Janata Party और कांग्रेस के बीच वैचारिक टकराव नया नहीं है। लेकिन भाषा की तीक्ष्णता और मंच की प्रकृति इस बहस को अधिक संवेदनशील बना देती है। जब देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्टार्टअप और डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने की बात कर रहा हो, तब राजनीतिक संवाद का स्तर भी उतना ही परिपक्व होना अपेक्षित है।
यह भी सच है कि चुनावी माहौल या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बयान अक्सर समर्थकों को उत्साहित करने के उद्देश्य से दिए जाते हैं। परंतु दीर्घकालिक दृष्टि से लोकतांत्रिक संस्थाओं और सार्वजनिक विमर्श की गरिमा बनाए रखना सभी दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
अंततः, यह प्रकरण केवल एक बयान का विवाद नहीं, बल्कि उस व्यापक प्रश्न का संकेत है कि क्या हम विकास के मंचों को राजनीतिक संघर्ष से अलग रख पाएंगे, या हर मंच अंततः चुनावी अखाड़ा बनता जाएगा? लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, पर संवाद की मर्यादा ही उसकी असली ताकत है।
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