अली के बाद उनके दो बेटों- हसन इब्न अली और हुसैन इब्न अली, ने उनके संघर्ष को आगे बढ़ाया। 680 ईस्वी में हुसैन और उनके कुछ समर्थकों को कर्बला की लड़ाई में शहीद कर दिया गया क्योंकि उन्होंने उस दौरान के खलीफा यजीद प्रथम के प्रति निष्ठा की शपथ लेने से इनकार कर दिया था।
यजीद प्रथम के शासनकाल को अन्याय से भरा हुआ और इस्लाम के मूल सिद्धांतों से दूर माना जाता था। मुहर्रम के महीने के 10वें दिन हुसैन और उनके समर्थकों की शहादत हुई थी और कर्बला की लड़ाई ने इसे महान स्तर पर पहुंचा दिया।
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान के सरकारी टीवी और कई अफसरों ने कहा कि उन्होंने शहादत हासिल की है। दुनिया भर में शहीद या शहादत का मतलब किसी मकसद, किसी धार्मिक काम के लिए अपनी जान कुर्बान करना होता है लेकिन ईरान में इसका मतलब काफी गहरा और सांस्कृतिक भी है।
शिया इस्लाम इस्लामिक गणराज्य ईरान का आधिकारिक धर्म है। ईरान में शहादत केवल एक धार्मिक अवधारणा नहीं है बल्कि यह ईरान की राजनीतिक सोच का अहम हिस्सा है।
अगर आप ईरान के इतिहास को देखें तो कई मौकों पर शहादत की अवधारणा काफी मजबूत हुई है। विशेषकर 1980-88 के ईरान-इराक युद्ध में किए गए बलिदान को ईरान की राष्ट्रीय पहचान का अहम हिस्सा बनाया गया। साल 2022 में महसा अमीनी नाम की युवती की मौत के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे तो इन प्रदर्शनों के दौरान वहां मारे गए प्रदर्शनकारी “वूमेन, लाइफ, फ्रीडम” के नारे के प्रतीक बन गए थे।
इस्लाम में शिया समुदाय मानता है कि पैगंबर मोहम्मद के बाद राजनीतिक और धार्मिक सत्ता उनके जैविक वंशजों को मिलनी चाहिए थी लेकिन 632 ईस्वी में पैगंबर मोहम्मद के अनुयायियों के बीच विवाद हो गया।
विवाद बढ़ने के बाद वे दो गुटों में बंट गए। इनमें से एक गुट की कमान पैगंबर मोहम्मद के सहयोगी अबू बकर के पास थी जबकि दूसरे समूह का नेतृत्व पैगंबर मोहम्मद के चचेरे भाई और दामाद अली ने किया था। अबू बकर इस्लाम के पहले खलीफा बने और उनके समर्थकों को सुन्नी मुसलमान कहा गया, दूसरी ओर अली के साथ आने वाले लोग शिया मुसलमान कहलाए।
जब अली चौथे खलीफा बने तो उनके शासनकाल में सुन्नियों और उनके समर्थकों यानी शियाओं के बीच कई हिंसक संघर्ष हुए। 661 ईस्वी में अली की हत्या कर दी गई और तब उन्हें शिया इस्लाम में पहला शहीद माना गया।
अली के बाद उनके दो बेटों- हसन इब्न अली और हुसैन इब्न अली, ने उनके संघर्ष को आगे बढ़ाया। 680 ईस्वी में हुसैन और उनके कुछ समर्थकों को कर्बला की लड़ाई में शहीद कर दिया गया क्योंकि उन्होंने उस दौरान के खलीफा यजीद प्रथम के प्रति निष्ठा की शपथ लेने से इनकार कर दिया था।
यजीद प्रथम के शासनकाल को अन्याय से भरा हुआ और इस्लाम के मूल सिद्धांतों से दूर माना जाता था। मुहर्रम के महीने के 10वें दिन हुसैन और उनके समर्थकों की शहादत हुई थी और कर्बला की लड़ाई ने इसे महान स्तर पर पहुंचा दिया।
शिया इस्लाम की मान्यताओं के मुताबिक, हुसैन की शहादत अत्याचार के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध थी। हुसैन के बलिदान को न्याय और सम्मान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। हुसैन की याद में हर साल मुहर्रम के दसवें दिन आशूरा मनाया जाता है। इस दौरान उनकी शहादत को याद किया जाता है।
हुसैन की याद में होने वाले कार्यक्रम ईरान के लोगों के जीवन का अहम हिस्सा हैं। हुसैन की शहादत से जुड़ी घटनाओं की याद आज भी ईरान के सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक ताने-बाने में अहम भूमिका निभाती है।
1978-79 की इस्लामिक क्रांति के दौरान हुसैन की शहादत को एक प्रेरणा शक्ति माना गया और आखिरकार इसने पहलवी शासन के पतन और ईरान में इस्लामिक शासन के सत्ता में आने का रास्ता तैयार किया। इस्लामिक क्रांति के नेता और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की नींव रखने वाले अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी ने ईरान में शहादत के विचार को विशेष महत्व दिया। उन्होंने इसे इस्लामिक आस्था का सम्मानजनक पहलू माना। इस वजह से ईरान में आज भी शहादत सार्वजनिक चर्चा का प्रमुख विषय है।
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