दुर्ग/ दुर्ग निवासी श्रीमती रेनु वर्मा ने स्व-सहायता समूह से जुड़कर अपने जीवन में बड़ा बदलाव लाया है। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान के सहयोग से उन्होंने कई आजीविका गतिविधियाँ शुरू कर आज अच्छी आय अर्जित कर रही हैं। श्रीमती रेनु वर्मा बताती हैं कि समूह से जुड़ने से पहले उनके सामने कई आर्थिक समस्याएँ थीं। घर की आय सीमित थी और किसी भी छोटे व्यवसाय को शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं थी। कई बार उन्हें जरूरत पड़ने पर अधिक ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ता था, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ जाता था। संसाधनों की कमी, व्यवसाय का अनुभव न होना और बाजार की जानकारी का अभाव भी उनके सामने बड़ी चुनौतियां थीं।
बिहान स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने नियमित बचत शुरू की। समूह के माध्यम से उन्हें रिवॉल्विंग फंड तथा बैंक ऋण प्राप्त हुआ। प्राप्त राशि का उपयोग उन्होंने अपनी आजीविका को मजबूत करने में किया। उन्होंने चॉइस सेंटर की शुरुआत की, जहां ग्रामीणों को आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र, पैन कार्ड, आधार अपडेट, बिजली बिल भुगतान जैसी ऑनलाइन सेवाएँ उपलब्ध कराई जाने लगीं। इसके अलावा उन्होंने सब्जी बाड़ी के माध्यम से मौसमी सब्जियों की उन्नत खेती शुरू की और स्थानीय बाजार में उसकी बिक्री की। साथ ही पशुपालन के तहत गाय पालन शुरू कर दुग्ध उत्पादन से नियमित आय का स्रोत भी बनाया। शुरुआती दौर में इन कार्यों को स्थापित करने में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन बिहान मिशन के प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और समूह के सहयोग से उन्होंने धीरे-धीरे अपने कार्यों को व्यवस्थित कर लिया।
आज चॉइस सेंटर से उन्हें प्रतिमाह लगभग 25 से 30 हजार रुपये की आय होने लगी है। सब्जी बाड़ी से उन्हें सालाना लगभग एक से 1.50 लाख रुपये की आय प्राप्त कर रही है, वहीं पशुपालन से प्रतिमाह 15 से 30 हजार रुपये तक की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है। इन सभी गतिविधियों को मिलाकर उनकी वार्षिक आय लगभग 6 से 7 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है।
श्रीमती रेनु वर्मा की इस सफलता से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा बेहतर विद्यालय में शुरू कराई है और अपने घर की आवश्यक सुविधाओं को भी पूरा किया है। आज वे गांव की अन्य महिलाओं को भी स्व-सहायता समूह से जोड़कर स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। श्रीमती रेनु वर्मा कहती है कि यदि महिलाओं को सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग मिले, तो वे कठिन परिस्थितियों को पार कर आत्मनिर्भर बन सकती हैं और “लखपति दीदी” बनने का सपना भी साकार कर सकती हैं।
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