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छात्र राजनीति से शुरुआत और छात्रों के गुस्से के चलते गई कुर्सी, पढ़िए धर्मेंद्र प्रधान के उतार-चढ़ाव वाले राजनीतिक सफर की कहानी
  • Written by - amulybharat.in
  • Last Updated: 25 जुलाई 2026,  09:51 PM IST
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छात्र राजनीति से शुरुआत और छात्रों के गुस्से के चलते गई कुर्सी, पढ़िए धर्मेंद्र प्रधान के उतार-चढ़ाव वाले राजनीतिक सफर की कहानी

NEET पेपर लीक मामले में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दबाव के चलते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफा दे दिया है। वे पिछले वर्षों में बीजेपी के सबसे टिकाऊ और बड़े मंत्री के तौर पर उभरे थे। उन्हें एक कुशल मैनेजर और राजनीतिक प्रबंधक के तौर पर देखा जाता है, जो कि आलाकमान के करीबी भी हैं।

ओडिशा से आने वाले धर्मेंद्र प्रधान, राष्ट्रीय राजनीति में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे हैं। 26 जून, 1969 को एक राजनीतिक परिवार में जन्मे प्रधान बचपन से ही आरएसएस की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में गहराई से जुड़े रहे। उनके पिता देबेंद्र प्रधान एक डॉक्टर थे। वे ओडिशा में भाजपा के एक प्रमुख नेता थे और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री बने थे।

धर्मेंद्र प्रधान ने लड़ा था छात्र संघ का चुनाव

धर्मेंद्र प्रधान ने होमटाउन के तालचर कॉलेज में उच्च माध्यमिक छात्र के रूप में शुरुआत करते हुए ABVP की सदस्यता ली थी। वे 1985 में कॉलेज के छात्र संघ के अध्यक्ष 1993 में एबीवीपी के राज्य सचिव और 1995 में इसके राष्ट्रीय सचिव बने थे। धर्मेंद्र प्रधान के प्रमुख शिक्षा संस्थान भुवनेश्वर स्थित उत्कल विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 1990 में छात्र संघ का चुनाव लड़ा था। वे अरुण साहू से चुनाव हारे थे, जो कि बीजेडी के एक वरिष्ठ नेता थे। 

अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने 1998 में बीजेपी में प्रवेश किया और 2000 में बीजेडी-भाजपा गठबंधन सरकार में पल्लहारा सीट से पहली बार विधायक बने। विधायक के रूप में उन्हें ओडिशा विधानसभा के सर्वश्रेष्ठ विधायक पुरस्कार उत्कलमणि गोपबंधु प्रतिभा सम्मान से सम्मानित किया गया। पार्टी संगठन में सक्रिय प्रधान 2001 में पार्टी के युवा विंग के अध्यक्ष बने और 2002 में राष्ट्रीय सचिव के पद पर पदोन्नत हुए। 2004 में वे बीजेपी के युवा विंग, भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।

संसदीय राजनीति में एंट्री

धर्मेंद्र प्रधान साल 2004 में वे देवगढ़ से लोकसभा के लिए चुने गए। बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय प्रधान को 2012 में बिहार से राज्यसभा की सीट मिली और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 2014 में वे पेट्रोलियम मंत्री बने। अपने कार्यकाल के दौरान वे उज्ज्वला जैसी योजनाओं और एलपीजी की पहुंच बढ़ाने के व्यापक प्रयासों से जुड़े रहे। 

2014 के बाद पूरे भारत में बीजेपी के उदय के बाद प्रधान को ओडिशा में पार्टी का सबसे प्रमुख चेहरा माना जाता था और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से उनकी घनिष्ठता जगजाहिर थी। उन्होंने 2018 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए पुनः नामांकन प्राप्त किया और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपना स्थान बरकरार रखा।

प्रधान को 2021 में शिक्षा मंत्रालय का प्रभार दिया गया था, जिसे उन्होंने एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल में भी बरकरार रखा। 15 साल के अंतराल के बाद, प्रधान ने 2024 के लोकसभा चुनावों में प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति में वापसी की और संबलपुर निर्वाचन क्षेत्र से भारी बहुमत से जीत हासिल की।

ओडिशा में बीजेपी की जीत में अहम भूमिका

धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा में बीजेपी के संगठनात्मक आधार के सूत्रधार भी हैं। उन्होंने उस समय राज्य का दौरा किया जब पार्टी की वहां नाममात्र की उपस्थिति थी, और संभावित जमीनी स्तर के नेताओं को पार्टी में शामिल करने में सफल रहे। धर्मेंद्र प्रधान की रणनीतियों के कारण ही बीजेपी ने 2017 के पंचायत चुनावों में शानदार जीत हासिल की और 2019 के लोकसभा चुनावों में आठ सीटें जीतीं। 2024 में बीजेपी के अपने दम पर सत्ता में आने और बीजू जनता दल (बीजेडी) को हराने में उनकी अहम भूमिका थी।

पार्टी के सहयोगियों के बीच एक सक्षम प्रबंधक और कुशल योजनाकार के रूप में जाने जाने वाले प्रधान ने अन्य राज्य चुनावों में भी बीजेपी की जीत सुनिश्चित करके अपने संगठनात्मक कौशल को साबित किया था। बीजेपी के भीतर प्रधान अमित शाह के करीबी और भूपेंद्र यादव और विनोद तावड़े जैसे नेताओं के साथ पार्टी की केंद्रीय सत्ता संरचना का हिस्सा रहे हैं।

उनकी ताकत सार्वजनिक आकर्षण से कहीं अधिक संगठनात्मक विश्वसनीयता में निहित है। उन्होंने कई राज्यों में पार्टी के लिए अभियान रणनीतिकार, राज्य प्रभारी और समस्या-समाधानकर्ता के रूप में काम किया है। वफादारी, उपयोगिता और राजनीतिक सूझबूझ के इस संयोजन ने उन्हें विवादों और जनविरोध के समय में भी प्रासंगिक बनाए रखा है।

विवादों के चलते बढ़ी मुसीबतें

शिक्षा क्षेत्र में अपने कार्यकाल के दौरान उनकी भूमिका प्रशासक से बढ़कर एक राजनीतिक योद्धा की हो गई। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का बचाव किया, मातृभाषा और बहुभाषी शिक्षा का समर्थन किया और प्रधानमंत्री-श्री नीति और संबंधित सुधार एजेंडा को आगे बढ़ाया, लेकिन मंत्रालय परीक्षा की निष्पक्षता, गैर-भाजपा राज्यों के साथ केंद्र-राज्य तनाव और कार्यान्वयन संबंधी सवालों से भी घिरा रहा।उनके कार्यकाल में सबसे बड़ा झटका राष्ट्रीय परीक्षाओं में जनता के विश्वास को बार-बार लगी चोट थी, जिसमें मंत्रालय को पेपर लीक के आरोपों, परीक्षाओं को रद्द करने और उनमें बदलाव करने, और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी और भर्ती परीक्षाओं के संचालन को लेकर विपक्ष की आलोचना का सामना करना पड़ा।


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