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लोकधुनों और लोकनृत्यों से सजा ‘लोकरंग पर्व’, भरथरी गाथा ने बांधा समां
  • Written by - amulybharat.in
  • Last Updated: 6 सितम्बर 2026,  10:19 PM IST
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लोकधुनों और लोकनृत्यों से सजा ‘लोकरंग पर्व’, भरथरी गाथा ने बांधा समां

तीन दिवसीय आयोजन में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं का जीवंत प्रदर्शन, नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का संदेश

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रायपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को संरक्षित करने और कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘लोकरंग पर्व’ का रविवार को रायपुर स्थित मुक्ताकाशी मंच, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में भव्य शुभारंभ हुआ। 6 से 8 सितंबर तक चलने वाले इस आयोजन में प्रदेश की पारंपरिक लोकविधाओं की विविध रंगत देखने को मिल रही है।

कार्यक्रम के पहले दिन मुक्ताकाशी मंच पर छत्तीसगढ़ी लोकधुनों और पारंपरिक लोकगाथाओं ने ऐसा समां बांधा कि दर्शक लोकसंस्कृति की जीवंत दुनिया से जुड़ते नजर आए। आयोजन की शुरुआत भरथरी गाथा की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद कलाकारों ने पंडवानी, देवार गीत और भरथरी गाथा सहित विभिन्न लोकविधाओं की प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं।

*लोककलाओं की विविधता ने मोहा मन*

लोकरंग पर्व में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर दिया जा रहा है। आयोजन में भरथरी गाथा, देवार गीत, करमा नृत्य, सरहुल, लोरिक-चंदा, ददरिया, पंडवानी और पंथी जैसी विविध लोककलाओं की प्रस्तुतियां शामिल हैं।

पहले दिन सुश्री दुर्गा साहू ने पंडवानी, श्रीमती पूनम तिवारी ने देवार गीत तथा सुश्री अरुणिमा शर्मा ने भरथरी गाथा की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। कलाकारों की प्रस्तुतियों में छत्तीसगढ़ की लोकजीवन की संवेदना, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाई दी।

*स्थानीय कलाकारों को मंच देना आयोजन का प्रमुख उद्देश्य*

कार्यक्रम के संचालक एवं संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि स्थानीय मंचों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोकविधाओं से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है और उन्हें अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन प्रदेश की ‘सुघर’ संस्कृति, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाने के साथ युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की लोककलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रदेश के इतिहास, सामाजिक जीवन, लोकविश्वास और सामुदायिक परंपराओं की गहरी छाप दिखाई देती है। ऐसे आयोजनों के जरिए इन परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

*कला-संस्कृति प्रेमियों की रही मौजूदगी*

लोकरंग पर्व के शुभारंभ अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, उपसंचालक श्री उमेश मिश्रा, छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि मीर अली मीर, बॉलीवुड अभिनेत्री श्वेता पड्डा , वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार श्री दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार श्री विजय मिश्रा सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं कला-संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

*8 सितंबर तक जारी रहेगा लोकसंस्कृति का उत्सव*

तीन दिवसीय लोकरंग पर्व 8 सितंबर तक चलेगा। आगामी दिनों में भी छत्तीसगढ़ की विभिन्न लोकविधाओं से जुड़े कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। आयोजन के माध्यम से रायपुरवासियों को प्रदेश की पारंपरिक लोककलाओं, लोकसंगीत, लोकगाथाओं और लोकनृत्यों की विविधता को करीब से देखने और सुनने का अवसर मिल रहा है।

मुक्ताकाशी मंच पर सजी यह सांस्कृतिक संध्या छत्तीसगढ़ की उस लोकपरंपरा की तस्वीर प्रस्तुत कर रही है, जिसमें माटी की महक, लोकजीवन की सहजता और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत एक साथ दिखाई देती है।


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