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छत्तीसगढ़ की बोलियाँ भाषा के मुकुट की अनमोल धरोहर: शकुंतला तरार
  • Written by - amulybharat.in
  • Last Updated: 4 अप्रैल 2026,  10:51 AM IST
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छत्तीसगढ़ की बोलियाँ भाषा के मुकुट की अनमोल धरोहर: शकुंतला तरार

रायपुर, छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय बोलियाँ भाषा की समृद्धि और विविधता की पहचान हैं। इन्हें भाषा रूपी मुकुट में जड़े रत्नों की संज्ञा देते हुए प्रख्यात साहित्यकार शकुंतला तरार ने कहा कि हर बोली अपने भीतर एक अलग संस्कृति, लहजा और भावनात्मक गहराई समेटे हुए होती है, जो भाषा को जीवंत और प्रभावशाली बनाती है।
यह विचार उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित साहित्योत्सव 2026 के दौरान व्यक्त किए। यह आयोजन साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 30 मार्च से 4 अप्रैल तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें देशभर की 50 से अधिक भाषाओं और 650 से अधिक साहित्यकारों व विद्वानों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।

श्रीमती तरार ने अपने वक्तव्य में कहा कि छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी, सादरी, गोंडी, कुडुख सहित कई स्थानीय बोलियाँ न केवल भाषा की पहचान हैं, बल्कि समाज की परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिबिंब भी हैं। प्रत्येक बोली की अपनी विशिष्टता होती है—चाहे वह लोकगीत हों, उच्चारण की शैली हो या शब्दों का भंडार।
उन्होंने बताया कि मिनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में 18 स्थानीय बोलियों में प्राथमिक शिक्षा देने की पहल की गई है, जिससे इन भाषाओं का संरक्षण और विस्तार संभव हो रहा है। यह कदम आने वाली पीढिय़ों को अपनी जड़ों से जोडऩे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
अपने संबोधन में उन्होंने पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने लोकभाषा और कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया है। उनकी प्रस्तुति शैली और अभिव्यक्ति यह साबित करती है कि भाषा की शक्ति केवल शब्दों तक सीमित नहीं होती, बल्कि भाव और प्रस्तुति भी उसे सशक्त बनाते हैं।
कार्यक्रम के दौरान शकुंतला तरार के विचारों को साहित्यकारों और भाषाविदों ने सराहा तथा छत्तीसगढ़ की बोलियों के संरक्षण में उनके योगदान की प्रशंसा की। यह स्पष्ट है कि क्षेत्रीय बोलियाँ न केवल भाषा को समृद्ध बनाती हैं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में भी अहम भूमिका निभाती हैं।


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