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सफलता की कहानी
  • Written by - amulybharat.in
  • Last Updated: 29 अप्रैल 2026,  10:55 PM IST
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सफलता की कहानी

मजदूरी की बेड़ियों को तोड़ ‘‘मल्टी-फार्मिंग‘‘ के नायक बने ललित यादव

6 गायों से शुरू किया था डेयरी का सफर अब 25 गायों तक पहुंचा

रायपुर। दंतेवाड़ा जिले के गीदम विकासखंड अंतर्गत ग्राम गुमड़ा में आज एक नई क्रांति की सुखद आहट सुनाई दे रही है। यह कहानी किसी बड़े उद्योगपति की नहीं, बल्कि 36 वर्षीय एक ऐसे जुझारू व्यक्तित्व की है जिसने मजदूरी के कठिन दौर से निकलकर अपनी तकदीर खुद लिखी है। ललित यादव, जो कभी अपनी आजीविका के लिए दूसरों के खेतों और निर्माण कार्यों पर निर्भर थे, आज अपने गांव में बहुआयामी खेती और डेयरी व्यवसाय के जरिए समृद्धि की एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। उनकी यह यात्रा वर्ष 2013 में मात्र 6 गायों के साथ शुरू हुई थी, जो आज उनके अटूट साहस और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण 25 गायों के एक विशाल कुनबे में तब्दील हो चुकी है।

ललित की सफलता का सबसे बड़ा राज पारंपरिक खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ना रहा है। पशुपालन विभाग के निरंतर सहयोग और मार्गदर्शन से उन्होंने अपनी डेयरी को न केवल व्यवस्थित किया, बल्कि जर्सी और एचएफ क्रॉस जैसी उन्नत नस्लों को अपनाकर दूध उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया। वर्तमान में उनके फार्म से प्रतिदिन 70 से 80 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है, जो बाजार में 70 रुपये प्रति लीटर की दर से बिककर उनकी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर रहा है। उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्होंने नेपियर घास की खेती का सहारा लिया, जिससे पशुओं को बारहमासी पौष्टिक चारा तो मिलता ही है, साथ ही चारे पर होने वाले बाहरी खर्च में भी भारी कटौती हुई है।

ललित की दूरदर्शिता केवल डेयरी तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने आय के स्रोतों को विविधता प्रदान करने के लिए ‘‘मल्टी-फार्मिंग‘‘ का मॉडल तैयार किया। डेयरी के साथ-साथ वे छोटे स्तर पर मुर्गी पालन और सब्जी उत्पादन भी कर रहे हैं, जिससे उन्हें साल भर नियमित नकद आय प्राप्त होती रहती है। दूध की अधिकता होने पर वे मूल्य संवर्धन की दिशा में कदम बढ़ाते हुए पनीर का निर्माण करते हैं, जो 400 रुपये प्रति किलो की दर से हाथों-हाथ बिक जाता है। इसके साथ-साथ वे डेयरी व्यवसाय से प्राप्त होने वाले गोबर खाद की भी क्षेत्र के किसानों में भारी डिमांड है जो उनकी आय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है यहा तक कि अन्य जिलों के किसान जैविक खाद के रूप में 3000 से 3500 रुपये प्रति ट्रैक्टर की दर से खरीदने उनके द्वार तक पहुँचते हैं।

शासन की कल्याणकारी योजनाओं और बैंकिंग सुविधाओं का सही तालमेल ललित के व्यवसाय विस्तार में मील का पत्थर साबित हुआ। उन्होंने डेयरी शेड और फेंसिंग जैसी सुविधाओं के लिए बैंक से लिए गए 3 लाख रुपये के ऋण को अपनी कड़ी मेहनत से समय से पूर्व ही चुकता कर अपनी विश्वसनीयता सिद्ध कर दी है। आज इस पूरे उपक्रम में उनका परिवार एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़ा रहता है। अपनी माँ के संघर्षों को याद करते हुए ललित भावुक होकर बताते हैं कि उनकी माँ ने एक आंगनबाड़ी सहायिका के रूप में विपरीत परिस्थितियों में उन्हें पढ़ाया-लिखाया, और आज उन्हीं के संस्कारों का फल है कि वे न केवल आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए एक प्रेरक प्रकाश स्तंभ बनकर उभरे हैं। ललित यादव की यह सफलता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि सही मार्गदर्शन और ईमानदारी से प्रयास किए जाएं, तो ग्रामीण अंचलों में भी खुशहाली का नया अध्याय लिखा जा सकता है।

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